Sunday, April 26, 2009

एक ही हाल

बेदारियां -(५)

अलबेदार


हम बहैसियत मुसलमान इस वक्त अपने विरोधियों के निशाने पर हैं, ख्वाह वह भू भाग का कोई भी टुकडा क्यों न हो, मुस्लिम शाशन में हो, या गैर मुस्लिम प्रभुत्व में हो, छोटा सा गाँव हो, कस्बा हो, छोटा या बड़ा शहर हो, हर जगह मुसलमान अपने आप को असुरक्षित मानता है, खास कर वह मुसलमान जो वक्त के अनुसार बेहतर और जागरुक समाजी ज़िन्दगी जीने का हौसला रखता है. उस के लिए दूर दूर तक आंतरिक और वाह्य दोनों तौर पर रोड़े बिखरे हुए हैं. वाह्य रूप में देखें तो दुन्या इन मुसलमानों के लिए कोई नर्म गोशा इस लिए नहीं रखती कि इन का अतीत उनके प्रति इन्तेहाई दागदार है, और आंतरिक सूरते हाल ऐसी है कि ख़ुद इनका ही समाजी वातावरण इन्हें सदियों पीछे ले जाना चाहता है. हर संवेदन शील मुसलमान अपने ऊपर मंडराते खतरे को अच्छी तरह महसूस कर रहा है. वह अपने अन्दर छिपी हुई इस की वज़ह को भी अच्छी तरह जानता बूझता है. बहुत से सवाल वह ख़ुद से करता है, अपने को लाजवाब पाता है. ख़ुद से नज़र नहीं मिला पाता, जब कि वह जानता है हल उसके सामने अपनी उंगली थमाने को तय्यार खड़ा है क्यूंकि उसके समाज के बंधन उसके पैर में बेडियाँ डाले हुए हैं. वह शुतुर मुर्ग कि तरह सर छिपाने के हल को क्यूं अपनाए हूए है? वह अपनी अस्तित्व को किस के हवाले किए हुए है? इसी कशमकश में वह ख़त्म हो जाता है, और अपनी नस्लों को खौफनाक भविष्य में ढकेल जाता है.
हमें चाहिए हम आँखें खोलें, सच्चाइयों का सामना करते हुए उनको तस्लीम कर लें। याद रखें सच्चाई को तस्लीम करना ही सब से बड़ी अन्दर की बहादुरी है. दीन के नाम पर रूढियों(क़दामातों) पर डटे रहना जहालत है. कल की अलौकिक (माफौकुल-फितरत) बातें और मिथ्य (दरोग बाफियाँ) आज के साइंस्तिफिक हल २+२=४ कि तरह सच नहीं हैं. आधुनिक और जदीद तरीन सत्य और सदाक़तें अपने साथ नई मूल्य लाई हैं. इन में शहादतें और पाकीज़गी है. वह अतीत के मुजरिमों का बदला इनकी नस्लों से नहीं लेतें. वह क़ुरआनी आयातों की तरह काफिर की औरतों और बच्चो को "मिन जुमला काफिर" करार नहीं गरदान्तीं (गिनते). वह तो काफिर और मोमिन का अंतर भी नहीं करतीं. इन में प्रति-शोध ( इन्तेक़ाम) का कोई खुदाई हुक्म भी नहीं है, न इन का कोई मुन्तक़िम(बदला लेने वाला) खुदा है. हमें इन जदीद सदाकतों और पवित्र मूल्यों को तस्लीम कर लेने की ज़रूरत है. हमें तौबा इन के एहसासात (अनुभूतियों)के सामने आकर करना चाहिए और हम तौबा जाने कहाँ कहाँ वहमों और गुमानों के सामने करते फिर रहे हैं, यह नई सदाकतें, यह पाक क़द्रें किसी पैगम्बर की ईजाद नहीं, किसी समूह की नहीं, किसी कबीले की नहीं, किसी भू-भाग की नहीं, हजारों सालों से इंसानियत के पौदों के फूल की खुशबू से यह वजूद में आई है. बिना किसी शंका, या शको शुबहा इन को "हर्फे-आखीर" और "आखिरी निज़ाम" कहा जा सकता है. ये रोज़ बरोज़ और ख़ुद बखुद सजती और संवारती चली जाएंगी. इन का कोई अल्लाह नहीं होगा, कोई पैगम्बर नहीं होगा, कोई जिब्रील नहीं होगा, न कोई शैतान ये मज़हबे-इंसानियत दुन्या का आखरी मज़हब होगा, आखरी निजाम होगा. अगर सब से पहले मुसलमान इसे कुबूल करें तो इन के लिए सब से बेहतर रास्ता होगा. आज दो राहे पर खड़ी क़ौम के लिए सही हल. दुन्या की कौमों में सफ़े-अव्वल में आने का एक सुनहरा मौक़ा और short cut रास्ता. इसके बाद बाकी भारत मानवता के अनुसरण में होगा.


'मोमिन'

2 comments:

  1. ऐसा कुछ नहीं है..पूरे विशव में भारत सबसे सुरक्षित देश है..सबके लिए.....

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  2. आपके इस वाक्‍य ''स्वयम्भू अंतिम अवतार (जिसके वर्तमान हिंदी कार्य वाहक आप बने हुए हैं)।'' के बारे में मेरा कहना है कि मुहम्‍मद सल्‍ल. स्‍वयं अंतिम अवतार नहीं बने अल्‍लाह ने कहा और बनाया,, अब तो कई हिन्‍दू भाईयों ने ऐतिहासि‍क शोध करके हिन्‍दू, जैन, बौध, ईसाई और यहूदियों का भी उन्‍हीं का अंतिम अवतार साबित कर दिया है, बहुत जल्‍द इसपर मेरा ब्‍लाग अंतिम अवतार पर देखोगे, फिलहाल मेरे ब्‍लाग islaminhindi.blogspto.com से पढिये श्रीवास्‍तव जी की पुस्‍तक 'हजरत मुहम्‍मद और भारतीय धर्मग्रंथ''
    आपके इस वाक्‍य ''ए आर रहमान का इस्लामी दुन्या में बड़ा शोर है,'' के बारे में मेरा कहना है कि आपके पास, आप जैसे लोगों में उनका शौर होगा, जो मेरे चारों तरफ हैं उनमें अक्‍सर नहीं जानते यकीन ना हो तो किसी किन्‍हीं 10 मुसलमानों से पूछ लो लेकिन वह मुसलमान जो दूर से ही पता लग जाता है कि यह मुसलमान है,दुनिया भी जानती है कौन हैं मुसलमान बस अन्‍जान बनी हुई हैं, मुसलमान वह जिसे देखकर पूछना ना पडे कि तुम मुसलमान हो तेरे और मेरे जैसे नहीं, ऐसे लोगों से पूछना फिर बताना कितनों को मालूम है कि कौन है ए आर रहमान, इसकी वजह है उसने इस्‍लाम कबूल किया है अपनाया नहीं, इस्‍लाम में संगीत, नाच गाने, बेहयाई से बचने को कहा गया है, जो इन पर ना चल सका, जिनके आपने नाम गिनाये हैं उनके लिये मेरा कहना है क‍ि वह नाम के मुसलमान हैं मेरे और तुम्‍हारे जैसे,
    आगे से कुरआन पर जो लिखो, उसका नेट पर मौजूद कुरआन के हिन्‍दी अनूवाद से लिखा करो ताकि दूध का दूध पानी पानी हो जाये,
    www.quranhindi.com (जमात इस्‍लामी हिन्‍द की पूरी वेब की pdf book मेरे ब्‍लाग से डाउनलोड कर लो)
    www.aquran.com (शिया भाई की)
    www.altafseer.com (अठारह भाषाओं में अनुवाद उपलब्‍ध, इसके हिन्‍दी अनुवाद को मैंने यूनिकोड कर लिया है जो वेब मित्रों को भेज कर मशवरा कर रहा हॅं कि कैसे इसे नेट पर डाला जाये)
    www.al-shaia.org (ईरान की वेब यूनिकोड में परन्‍तु अभी अधूरा, 70 से आगे की कोई सूरत यहां देख लिया करो)
    मुझे किताबी कीडा बताते हो, अरे मैं तो गुनहगार हूं , मैं भी नाम का मुसलमान हूं बस आप जैसों की इस्‍लाम पर बकवास ने मुझे मजबूर किया कि मैं लिखूं, दूध का दुध और पानी का पानी कर दूंगा, इन्‍शाअल्‍लाह
    अभी भी वक्‍त है पढ लो 'आपकी अमानत आपकी सेवा में' फिर ना कहना हमें कोई रास्‍ता दिखाने वाला नहीं मिला था, जिन को तुम ढपली कहते हो उन अल्‍लाह के चैलंजो पर दौबारा गौर करो, जो विस्‍तारपूर्वक मेरे ब्‍लाग पर हैं
    1- अल्‍लाह का चैलेंज पूरी मानव जाति को (क़ुरआन में 114 नमूने हैं उनमें से किसी एक जैसा अध्‍याय/सूरत बनादो)
    http://islaminhindi.blogspot.com/2009/02/1-7.html
    2- अल्लाह का चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता।
    http://islaminhindi.blogspot.com/2009/02/3-7.html
    3- अल्लाह का चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे
    http://islaminhindi.blogspot.com/2009/02/4-7.html
    4- अल्‍लाह का चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं
    http://islaminhindi.blogspot.com/2009/02/blog-post.html
    2009
    5- अल्‍लाह का चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार
    http://islaminhindi.blogspot.com/2009/02/5-7.html
    2009
    6- खुदाई चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी’’
    http://islaminhindi.blogspot.com/2009/02/2-7.htm

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